इस्माला

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Ismala - गुलाब के फूल उसे बेहद पसंद थे। एक शाम को वो अपनी सहेलियों के साथ खड़ी थी और जैसे ही मैं पहुंचा उसने एक गुलाब बड़े ही रोमांटिक अंदाज़ में मेरी तरफ बढ़ाया। मैं हालांकि शुरू से थोड़ा शर्मीला रहा हूँ पर फिर भी मैंने वो गुलाब उससे ले लिया।

इस्माला

बर्ष 2000 में डैडी का तबादला बिहार के मोकामाघाट में हुआ। CRPF का ग्रुप सेंटर होने के कारण लगभग सबको फ़ैमिली क्वार्टर्स मिले हुए थे। जब डैडी हमें वहां लेकर गए तब मैं महज़ 12 बर्ष का था और मेरा भाई 11 का। हम दोनों की उम्र में साढ़े 14 महीने का अंतर था। बहुत भाग दौड़ करने से CRPF के केंद्रीय विधालय में 7th (A) में दाख़िला भी मिल गया। और फिर धीरे - धीरे कुछ दोस्त भी बनने शुरू हुए। दाख़िला हमें कुछ देरी से मिला था तो सिलेबस बहुत पीछे छूट चूका था और हमारे दाखिले के एक माह के बितर ही 3 माही परीक्षाएं शुरू हो गईं।
इस्माला से मेरी दोस्ती भी इसी दौरान हुई थी। मैथ की परीक्षा में हम दोनों साथ ही बैठे थे। और मैंने कुछ प्रश्नों को हल करने में उसकी मदद की। पर विपरीत इसके उसने मेरे एक प्रश्न का गलत उत्तर निकालने में मेरी मदद की। मैं और इस्माला 4 अंकों से परीक्षा में असफल हो गए थे।
साहू सर के पास जो स्टूडेंट्स ट्यूशन पढ़ते थे उन में से भी सिर्फ २ लोग ही पास हो सके थे। और ये देख कर साहू सर काफी बौखलाए हुए थे। अंत में उन्होंने झुंझलाकर कहा, "24 नहीं तो जिसके 20 भी नंबर आये हैं वो खड़ा हो जाए।"
तब मेरे और इस्माला के सिवा २-३ और भी खड़े हो गए। मुझे देखकर सर काफी खुश हुए और कहा, "इन सबसे तो अच्छे तुम हो जो अभी 1 महीने के अंदर ही ऐसा रिजल्ट ले आये। ढ़ाई महीने से इन्हें पढ़ा रहा हूँ तब जा कर ये हाल है इनका।"
क्लास के बाद इस्माला मेरे पास आयी और कहने लगी, "मेरी वजह से तुम पास होने से रह गए, तुम सॉल्व सही कर रहे थे मुझे ही इन्टर्-फ़िअर् नहीं करना चाहिए था।"
इसके बाद से हमारे बिच काफी बातें होने लगीं। और पता ही नहीं चला के कब मैं उसका बेस्ट फ्रेंड भी बन गया था। एक दिन उसने एक लेटर मुझे थमाया और 7th बी में पढ़ने वाले एक ललन नाम के लड़के को देने के लिए कहा। मैंने भी बिना कुछ पूछे वो लेटर जा कर उस लड़के को दे दिया। जब वापिस आया तो सब लड़कियों ने मुझे घेर लिया और तरह - तरह की बातें करने लगीं - "तुम्हें पता भी है उस में क्या लिखा था?", "वो उसने उसे देने के लिए क्यों कहा?"
मैं बस इतना ही कह सका के शायद वो एक दूसरे से प्रेम करते हैं और मैं ऐसे लोगों की मदद करने से पीछे भी नहीं हट सकता।
मेरे भाई के जरिये एक दिन बात डैडी तक भी पहुँच गयी। और उसके बाद मम्मी और डैडी ने मिलकर काफी देर मेरी क्लास ली। प्रेम बचपन से मेरी रगों में बहता आया है और फिर चाहे वो किसी भी रूप में क्यों ना हो। मम्मी ने नाम पूछा तो मैंने इस्माला बता दिया। "नाम से तो मुस्लिम लगती है।", "डैडी ने कहा।
"तो?" मैंने भी भौहैं चढ़ा कर प्रश्न किया।
"वो लड़का भाग भुग गया तो इसके गले में पड़ जाएगी वो लड़की।" मम्मी को ताना मारते हुए कहा। "देखो ये बिहार है यहाँ रातों - रात उठवा कर शादी करवा देते हैं। फ़ैमिली बैकग्राउंड अच्छा हो बस यही देखते हैं।"
12 बर्ष की उम्र में दोस्ती और प्रेम के लिए मिट जाने के उस जज़्बे को मैं आज भी सलाम करता हूँ। "दोस्त है मेरी और अगर ऐसी नौबत आ भी गयी तो मैं कर लूंगा उससे शादी।" ये सुनने के बाद डैडी के पास कहने को कुछ नहीं था। पर मम्मी काफी देर तक समझाती रही।
वक़्त के साथ मेरी और इस्माला की दोस्ती और भी गहरी होती गयी। लंच में कभी भी मुझे बाकि लड़कों के साथ बाहर नहीं जाने देती थी। जब भी जाने लगता अपनी बाहें मेरे गले में डाल कर मुझे रोक लेती और अपने साथ बिठा कर लंच करवाती। हम ट्यूशन भी साथ साथ जाते थे। वहां ललन भी होता था।
गुलाब के फूल उसे बेहद पसंद थे। एक शाम को वो अपनी सहेलियों के साथ खड़ी थी और जैसे ही मैं पहुंचा उसने एक गुलाब बड़े ही रोमांटिक अंदाज़ में मेरी तरफ बढ़ाया। मैं हालांकि शुरू से थोड़ा शर्मीला रहा हूँ पर फिर भी मैंने वो गुलाब उससे ले लिया। हालाँकि बाद में लड़कियों ने उसे ये कह कर कुछ परेशान किया भी था के तुमने उसे ये फूल क्यों दिया। ये तो उसे दिया जाता है जिससे प्यार हो।
"हाँ तो? मुझे इससे प्यार नहीं है क्या? ये मेरे लिए सबसे ख़ास है। इसकी जगह सबसे ऊपर है और कोई नहीं ले सकता।"
इस्माला के साथ जितना भी वक़्त मिला मुझे मैंने उसे भरपूर जिया। लेकिन किस्मत को ना जाने क्या मंजूर था। 7th में हमारे सेक्शन से कुल 7 से 8 लोग ही पास हो सके थे। और उन में मेरा और इस्माला का नाम नहीं था। जिस विषय में सबसे सही था मैं उसी विषय में कैसे रह गया ये देख कर सब हैरान थे। इंग्लिश वाले के साथ जिस तरह का व्यवहार रहा था हमारा उसी की खुंदस निकाल ली आखिर में। मम्मी आयी थी रिजल्ट सुनने के लिए। इस्माला और कुछ और लड़कियां उनसे बात कर रही थीं, "आंटी अगर सन्नी रह गया तो हमारा सबका क्या होगा ?" जो हुआ मुझे उसका कोई अफ़सोस नहीं था बल्कि इस बात की ख़ुशी थी की मम्मी इस्माला से मिली। बाद में मम्मी ने पूछा भी था के उस लड़की का क्या नाम था जो घुंघराले बालों वाली थी।मैंने कुछ नहीं कहा बस इतना ही परिचय काफी था उनके लिए मेरी इस्माला का।
डैडी ने काफी कोशिश की पेपर रीचेक करवाने के लिए। पर मैं अगर किसी तरह पास हो भी जाता तो फिर भी इस्माला पीछे छूट जाती। चाहे असफल हो गया था मैं सबकी नज़र में पर मेरा मन ही जानता था के अपने साथ क्या ले जा रहा हूँ मैं। कुछ ऐसी यादें जिनका कोई मोल नहीं। इक ऐसा दोस्त जो मेरी समृतियों में हमेशा रहेगा।
मैंने वो स्कूल छोड़ दिया और गंगा किनारे बने एक सरकारी स्कूल में दाखिला ले लिया। मन बहुत उदास था और शांत करने के लिए इससे बेहतर जगह और कोई नहीं लगी। 10th उसी स्कूल से की मैंने। इन 3 बर्षों में मैं कभी इस्माला से नहीं मिल पाया। कभी - कभी ललन से मुलाक़ात होती थी। वो अक्सर यही कहता था के इस्माला तुम्हें बहुत याद करती है। कभी मिल लो उससे। और मैं हमेशा बस यही कहता, "कोशिश करूँगा कभी पर तुम उसके साथ रहना।"
दादा-दादी ने भी डैडी पे दबाब डालना शुरू कर दिया था हम सबको घर पे छोड़ने का। जिस कारण मुझे हिमाचल आना पड़ा। आगे की पढाई अब यहीं से करनी थी। पर मन कहीं पीछे भागा जा रहा था। कुछ अधूरा रह गया है अब भी मन बार-बार यही कहे जा रहा था। बहुत सोच-विचार के बाद मैंने फिर जिद्द की के मुझे वापिस बिहार ही जाना है। और मेरी जिद्द के कारण डैडी एक बार फिर हमें बिहार ले गए।
वहां पहुंचा तो पता चला के ललन 10th में फेल हो गया था और उसने खुदखुशी कर ली। मैं समझ सकता था उसके ऐसा करने के पीछे की बजह को। प्रेम के रस्ते सरल तो नहीं। बहुत दबाब था उस पर भी उसके घर वालों का। एक बार उसका लेटर जब इंग्लिश की ट्यूशन क्लास में मैडम के हाथ आ गया था तो बहुत बुरी तरह उसकी पिटाई की थी मैडम ने। और अगले दिन उसके पापा को बुला कर सब बताया गया। उन्होंने भी सबके सामने बहुत पीटा था उसे। और उस पर अब 10th में फेल होने के कारण सब रस्ते बंद होते दिखे होंगे उसे।
इस्माला को मेरी जरुरत थी। लेकिन मैं उसका सामना करने की हिम्मत ही नहीं जुटा सका। ललन के साथ उसकी प्रेम कहानी का जो हश्र हुआ, वही हश्र किसी दिन हमारी दोस्ती का भी होता। बस यही सोच कर मैंने सब हालातों पे छोड़ दिया। दादा-दादी ने फिर से हमें घर पे छोड़ने की बात की थी डैडी से। डैडी ने जब बताया तो मैंने भी लौट जाना ही बेहतर समझा। इस्माला और उसके शहर को अंतिम प्रणाम कर के मैं लौट आया।
काफी बर्षों बाद जब में दिल्ली, वज़ीराबाद में CRPF के IT इंस्टिट्यूट से 'O' Level कर रहा था तब मेरी एक लड़के से मुलाक़ात हुई थी और उसने भी यही कहा, "इस्माला तुम्हें बहुत याद करती है। वो मुझे मिली थी मैंने बताया था के तुम यहाँ हो। मेरे पास उसका नंबर है मैं देता हूँ बात कर लेना।“ जिस कागज़ के टुकड़े पे उसने नंबर लिखा था मेरे मन ने उसे खोलने तक की भी अनुमति नहीं दी। क्यूंकि इतने बर्षों की ख़ामोशी के बाद सुनामी ही आ सकती थी और ये सुनामी कहीं उसे पूरी तरह से तबाह भी कर सकती थी।
मुझे नहीं पता मैंने जो निर्णय लिया था उससे उसका कहाँ तक भला हुआ होगा। लेकिन हाँ जितना इस्माला एक बार मिलने के लिए तड़फी थी उतना मैं आज भी तड़फा करता हूँ। मैं जानता हूँ बचपन का वो साथी अब बहुत पीछे छूट गया है और उससे शायद इस जन्म में कभी भेंट भी ना हो। लेकिन कभी - कभी एक कविता में, मैं उसके साथ बिताये हर लम्हे को जी लिया करता हूँ :-
इस जीवन पे तुम्हारा
क़र्ज़ है प्रिय!

क़र्ज़ -
बचपन की उस दोस्ती का
बचपन के उस प्रेम का
जो तुमसे मुझे मिला|

कितना ही प्रेम करती थी तुम मुझे
शायद उससे भी ज्यादा
जिसे तुम चाहती थी|

गुलाब का फूल देते समय
तुम तनिक भी नहीं शर्माती थी
सहेलियां तुम्हारी तुम्हें छेड़ती थीं
तुम फिर भी नहीं शर्माती थी|

इसका कारण यह भी था के
शायद तुमने मुझे मन से
अपना सखा माना था,
जैसे द्रोपदी ने कृष्ण को|
लेकिन मैं ही गंवार समय रहते
तुम्हारे मैत्रीपन के भावों को
समझ ही नहीं पाया||

समाज के न जाने किस डर से
तुम्हें सखी सवीकार ही नहीं पाया|
जिसमें जो भाव तुमने ढूंढे
वो कृष्ण मैं बन ही नहीं पाया|
और आज इतने बर्षों बाद
मन तुम्हें पुकारता है,
आँखें तुम्हें ढूंढती हैं',
तुम्हारा हाथ थाम कर
बचपन की उन्हीं गलियों पे
निकलने को दिल चाहता है
तो तुम कहीं भी नज़र नहीं आती हो||

देश के दुसरे हिस्से से
आया था मैं तुम्हारे शहर में
तुमसे कोई वास्ता भी नहीं था
अजनबी ही थी तुम मेरे लिए
लेकिन शायद तुम्हें मुझ में
किसी जन्म का कोई साथी
दिख ही गया था,
तुम्हारे मन ने मुझे
पहचान ही लिया था|
लेकिन मैं ही पागल
तुम्हें पहचान ना पाया
और अब जब पहचाना है
तो तुम ना जाने कहाँ हो
तुम्हारा ना मिलना ही
इस जन्म में
शायद मेरी सज़ा है||

लेकिन मैं वादा करता हूँ सखी
किसी जन्म में मैं तुमसे फिर मिलूँगा
मैं आऊंगा फिर तुम्हारे लिए,
सिर्फ तुम्हारे लिए
तुम्हारी दोस्ती का कर्ज़
तुम्हारे प्रेम का ऋण
लौटाने के लिए...

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Sunny Singh "Akash"

Sunny Singh is a poet, author and publisher. He lives in Jawali city of India, and he has written various poems (Gazal and Nazm) in Hindi and Urdu language. He is a very creative person and after listening to his poems, fans forced to him to write stories or novels. So, from there, he tried his hand at writing.
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