अलका

Short Love Stories in Hindi, Sad, True & Emotional, लव स्टोरी इन हिंदी

Cute Love Story : ताका-झाँकी में कब तुमसे प्रेम भी हो गया खबर भी नहीं हुई। कई बार कहना चाहा था मैंने तुमसे पर कह नहीं पाया। एक रोज़ तुम्हें फ़ोन भी किया था मैंने पर तुम्हारी आवाज़ सुनने के बाद कुछ कह नहीं सका और फिर से तुम्हें फ़ोन करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई।

अलका

जब तुम्हें पहली बार देखा था तभी कुछ - कुछ एहसास हो गया था मुझे के तुमसे वास्ता पल दो पल के लिए नहीं सालों का रहने वाला है। यूँ तो हम स्कूल में सिर्फ २ बर्ष ही साथ रहे थे लेकिन अगले कई बर्षों तक मेरे मन पर तुम्हारा अधिकार रहा था।

मैंने तुम्हें अक्सर सिर्फ स्कूल की यूनिफार्म में ही देखा। हरे रंग की कमीज के साथ सफ़ेद रंग की सलवार और उस पर सफ़ेद रंग का दुपट्टा। इतनी सादगी में भी तुम्हारे रूप का कोई सानी नहीं था। शुरू - शुरू में तुम मुझे बस अच्छी लगती थी क्यूंकि आँख भर देखने में भी तो वक़्त लगता है। लेकिन आँख भर कर देखने का वक़्त ही कहाँ था हमारे पास। मैं कॉमर्स का छात्र और तुम आर्ट्स की छात्रा। हमारा मेल होता भी तो बस इंग्लिश की पहली क्लास में। और उस पर भी ब्रजेश सर का पहरा। फिर तुम आर्ट्स की क्लासेज के लिए चली जाती और मैं बिच - बिच में खिड़की से झांक कर तुम्हें देखा करता।

ताका-झाँकी में कब तुमसे प्रेम भी हो गया खबर भी नहीं हुई। कई बार कहना चाहा था मैंने तुमसे पर कह नहीं पाया। एक रोज़ तुम्हें फ़ोन भी किया था मैंने पर तुम्हारी आवाज़ सुनने के बाद कुछ कह नहीं सका और फिर से तुम्हें फ़ोन करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई।

तुम्हें अगर याद हो तो एक ही क्लास में होने पर भी २ बर्षों में हम सिर्फ एक ही बार बात कर सके थे। वो भी तुमने ही मुझे पुकारा था जब बर्जेश सर ने इंग्लिश के पेपर मेरे पास दिए थे जो नहीं आये थे उन्हें अगले दिन देने के लिए। तुम्हारी भी एक सहेली नहीं आई थी और तुमने जब मुझे मेरे नाम से पुकारा तो सच पूछो तो उसकी गूंज आज तक मेरे कानों से जाती नहीं है। तुमने मुझसे अपनी सहेली का पेपर माँगा और मेरे पास जो थे और जो बाकि लड़कों के पास थे वो भी सब लेकर मैंने तुम्हारे आगे ढ़ेर लगा दिया था। तुम मुस्कुराई तो बहुत थी पर मैं बाद में अपने किये पे काफी शर्मिंदा हुआ।

तुम्हारे लिए मेरा वो पवित्र प्रेम मेरी आँखों से झलकता भी था। और इसकी बातें सिर्फ हमारी क्लास में ही नहीं, पुरे शहर भर में होती थीं। मेरे साथ तुम औरों के मुक़ाबले में बेहद नरम रही। जब कोई तुम्हें बार - बार देखता था तो तुम उसे अक्सर ये कह कर धमकाया करती थी के "मामा को बुला लुंगी।" पर मेरे साथ तुमने ऐसा कभी नहीं किया। मेरी हर हरकत पे तुम मंद मंद मुस्कुरा देती थी। एक बार जब क्लास में मैं अपनी ही धुन में बैठा था तो दीवार पे ऊँगली से तुम्हारा नाम लिखने लगा। आरती के देखते ही मैं रुक गया और उसने जब तुम्हें बताया तो तुमने एक बार मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुरा कर कहा, लिखने दे। मेरे लिए तुम्हारी इस दरियादिली के बाबजूद भी मैं तुमसे अपने मन की बात नहीं कह सका।

जब मुझे पता चला था के तुम्हारे पापा नहीं हैं तो मुझे बेहद दुःख हुआ। पर ये जान कर ख़ुशी भी हुई के तुम्हारे और मेरे पापा का नाम एक सा ही है। मुझे लगा के जब तुम हमारे परिवार में आओगी तब तुम्हारी ये कमी भी पूरी हो जाएगी। पर जब किसी से पता चलता के तुम किसी और को चाहती हो तो मन उचट सा जाता और जिस कारण मैंने स्कूल में आना भी छोड़ दिया था। हफ्तों स्कूल से गायब रहता था मैं।

मेरे दोस्तों ने कई बार मुझसे कहा के तुमसे अपने प्यार का इज़हार कर दूँ लेकिन मैं उन्हें हमेशा यही कह कर टाल देता था, "वो ये तो जानती है के मैं उससे प्यार करता हूँ लेकिन कहीं अगर उसने ये पूछ लिया के कितना तो?" और किस हद तक मैं तुमसे प्यार करता था ये तो मैं भी नहीं जानता था।

मैं तुम्हारे साथ उम्र भर जीना चाहता था लेकिन कुछ पल भी मिल जाएं बात जहाँ तक आ गयी थी। तुम्हें पता है तुम पर सब लड़के मरते थे पर मेरे लिए अंत में सब पीछे हट गए थे। मनोज ने कहा भी था के तुमसे ज्यादा प्यार उसे कोई नहीं कर सकता। और अगर वो हम में से किसी को हाँ भी कर दे तो भी हम पीछे हट जायेंगे।

लड़कों के कहने पे भारती ने तुमसे पूछा भी था मेरे बारे में पर तुमने इंकार कर दिया। मैं जानता था के तुम ऐसा ही करोगी पर वो लोग नहीं माने। सच कहूं तो मैंने बस यही चाहा था के जब अपने पैरों पे खड़ा हो जाऊंगा तब तुम्हारे घर पे आकर तुम्हारा हाथ मागूंगा।

स्कूल के बाद तुमने यहीं पर कॉलेज में दाखिला ले लिया और मैं एक बर्ष के लिए दिल्ली और उसके बाद जलंदर चला गया। इस बिच मैंने तुमसे मिलने की कई बार कोशिश की। लेकिन किस्मत में शायद तुमसे दूर दूर की केवल एक ही भेंट लिखी थी। लगभग २ सालों बाद जब तुम्हें देखा तो तुम हलकी सी मोटी लग रही थी। तुम्हें इस रूप में देख कर मेरे मन को काफी सकून मिला। डैडी साथ थे इस बजह से मैं एक दीवार के पीछे छिप गया था। नहीं तो वो तुमसे मेरे दिल की बात कह ही देते। तुम शर्मिंदा होती इसी बजह से मैंने तुम्हारे सामने आना उचित नहीं समझा।

जब तुम्हारी शादी कहीं और तय हो गयी थी तो मैंने बेहद कोशिश की थी उसे रुकवाने के लिए। मैं तुम्हारे मंगेतर से भिड़ने तक को तैयार था और मैं चाहता था के जो हम दोनों में से बचता वो तुमसे शादी करता। लेकिन माँ और दादी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने मुझे ये कह कर समझाया के जैसे तुम हमारे लिए हो वैसे वो भी तो आखिर किसी का बेटा है और क्या पता कहीं अलका ही उसे चाहती हो। उसे जब पता चलेगा के तुमने ऐसा किया है क्या तब वो तुम्हारे प्रेम को स्वीकार लेगी?

मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं मन से तुम्हें अब हार चूका था। तुम्हारी शादी को जब कुछ ही दिन बचे थे तब मुझे एक लड़का मिला। वही जिसे हम सब डाकू कह कर बुलाते थे। उसने बहुत सी बातें की तुम्हारे बारे में। उसने कहा, "मैं अलका से मिला था और उससे ये भी कहा के एक लड़के के साथ तुमने अच्छी नहीं की। बहुत प्यार करता था वो तुम्हें।"

एक लम्भी सांस भरते हुए उसने फिर कहना शुरू किया, "भाई! मैंने तेरा नाम भी नहीं लिया उससे। उसने खुद ही कहा के तुम सन्नी की बात कर रहे हो न? उससे कहना के कभी खुद कहा मुझसे। खुद कहता तो मैं कुछ सोचती भी। पर अब बहुत देर हो चुकी है। एक लड़की ऐसे ही ऐसी बात नहीं करती वो तुम्हें कहीं न कहीं चाहती थी। तुम्हें खुद कहना चाहिए था एक बार।"

वो कहता रहा लेकिन मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी थी। मैं तुमसे लिपट के जी भर के रोना चाहता था उस दिन। कई बर्षों तक अधिकार रहा तुम्हारा मेरे मन पर। मैं सबसे क्या अपने आप से भी कटा रहा।

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Sunny Singh "Akash"

Sunny Singh is a poet, author and publisher. He lives in Jawali city of India, and he has written various poems (Gazal and Nazm) in Hindi and Urdu language. He is a very creative person and after listening to his poems, fans forced to him to write stories or novels. So, from there, he tried his hand at writing.
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