किस्सा

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Emotional Love Story in Hindi: हिंदुस्तान अब पूरी तरह से मेरे दिल में बस चूका था। कैलाश से उतरते वक़्त यही सोचती रही के अल्बर्ट के साथ आउंगी यहाँ कभी। अपने आप में इतना खो गयी थी के पता ही नहीं चला के कब बोरिस और अनस्तास्या से मैं बिछड़ भी गयी।

किस्सा

अल्बर्ट ने शादी का प्रस्ताव रखा तो मैं बेहद खुश हुई। काफी समय से मैं उसे जानती थी और मुझे बेहद पसंद भी था। डैड के ही बिज़नेस पार्टनर का बेटा  था तो एक-दूसरे के घर पे भी आना जाना लगा रहता था।

कुछ ही दिनों में हमारी सगाई हो गयी और इससे पहले के शादी की तारीख रखी जाती, मैंने अल्बर्ट से कहा, "मैं चाहती हूँ के मैं और तुम कहीं घूमने चलें। बीवी बन कर घूमने के तो काफी अवसर आयेंगे फिर जीवन में, पर मैं चाहती हूँ के किसी लम्भे सफर पे एक बार तुम्हारी मंगेतर, तुम्हारी प्रेयसी बन कर भी चलूँ।"

"तो फिर तुम ही बताओ के कहाँ चलना चाहती हो? जहाँ तुम कहोगी, वहीं चलेंगे।" अल्बर्ट मुझे कभी मना नहीं करता था। उस समय भी नहीं किया जब मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ इंडिया जाना चाहती थी। "अपना ख्याल रखना। किसी चीज़ की जरुरत हो तो मुझे बताना।" बस इतना कह कर उसने मेरा माथा चुम लिया और मैं इंडिया आ गयी।

मुंबई, गोवा, दिल्ली काफी जगह घूमे-फिरे हम। ऐसा लगने लगा था के इंडिया अपना ही वतन हो जैसे। बड़ा स्नेह मिला सबसे। लालकिले पे एक यूट्यूबर के साथ मिलकर वीडियो भी शूट की। ताज़महल को तो बस मैं देखती ही रह गयी थी। और काफी देर तक यही सोचती रही के अल्बर्ट भी मेरे लिए कभी ऐसा ही कुछ बनाये।

कुछ लोगों का समूह देखा। पूछा तो पता चला के श्रदालु हैं और मणिमहेश की तरफ जा रहे थे। थोड़ी और उत्सुकता बड़ी तो इंटरनेट पे सर्च किया। तस्वीरों में ही चौरासी मंदिर और मणिमहेश झील ने मन को मोह लिया था। हम सब भी अगले दिन सुबह उठते ही मणिमहेश के लिए चल दिए। काफी थकावट भरा सफर था। पर लोगों के उत्साह और उनके आराध्य महादेव के दर्शन की लगन को देखते हुए थकावट ज्यादा महसूस नहीं हुई। तस्वीरों में जितना देखा था उससे भी कहीं ज्यादा सूंदर था कैलाश।

हिंदुस्तान अब पूरी तरह से मेरे दिल में बस चूका था। कैलाश से उतरते वक़्त यही सोचती रही के अल्बर्ट के साथ आउंगी यहाँ कभी। अपने आप में इतना खो गयी थी के पता ही नहीं चला के कब बोरिस और अनस्तास्या से मैं बिछड़ भी गयी। काफी दूर तक जा कर देखा तो वो कहीं नहीं थे। कभी लगता के वो आगे निकल गए हैं तो कभी लगता के कहीं पीछे तो नहीं छूट गए। बेहद परेशान हो गयी थी मैं। एक किनारे पे बैठ कर मैं उनका इंतज़ार करने लगी। इससे पहले के रोना शुरू करती, मुझे उदास बैठा देख कर किसी ने पूछ ही लिया, "तुम ठीक तो हो ना?"

नज़रें उठा कर देखा तो सामने ५'-९" का एक हैंडसम खड़ा था। कैलाश की ओर जा रहा था। "मैं अपने दोस्तों से बिछड़ गयी हूँ। पता नहीं वो कहाँ हैं और फ़ोन भी काम नहीं कर रहा यहाँ पर।"

"ये इलाका कवरेज क्षेत्र से बाहर आता है। इसी बजह से मोबाइल में सिग्नल नहीं होता।" उसने बड़ी ही संजीदगी के साथ कहा। मैं अपने माथे पे हाथ रख के बैठी रही।

"आप अभी कैलाश जा रहे हो या..."

"वापिस और आप?" मैंने भी औपचारिकता में पूछ लिया।

"मैं अभी कैलाश की ओर ही जा रहा हूँ। पर मैंने आते वक़्त २ रुस्सियन कपल को देखा था। कहीं वो आपके दोस्त तो नहीं?" मेरे होंठों पर एक ख़ुशी की लहर दौड़ गयी।

"वो उम्र में २५ और २२ के हैं और लड़के की पीठ पे एक खाकी रंग का बैग भी है।" मैंने बड़ी उत्सुकता से उसकी तरफ देखते हुए कहा।

"उम्र में तो इतने के ही लगते थे पर बैग की और ध्यान नहीं दिया मैंने। करीब ३ कि० मि० निचे की ओर ही जाते देखा उन्हें।" मैं उसे शुक्रिया कह कर वहां से जाने लगी तो उसने फिर आवाज़ दी, "रुको! कहीं आप फिर से ना भटक जाओ तो आओ मैं ही आपको छोड़ देता हूँ।" उसने कहा और मैं ना भी नहीं कह सकी। मुझे उस समय उसका साथ आना ही सही लगा।

रास्ते में आते वक़्त वो बातें किये जा रहा था। शुरू में थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था पर जब एक दूसरे को जानना शुरू किया तो फिर अच्छा भी लगने लगा। उसने जब नाम पूछा तो मैंने बताया, "जाशा पैट्रोवा, रूस से। अभी - अभी ग्रेजुएशन कम्पलीट की है। दोस्तों के साथ ट्रिप पे आई थी इंडिया। पर अब जैसा के आप जानते हैं मैं उनसे बिछड़ चुकी हूँ।" वो ज़ोर से हंसा। मुझे बड़ा अजीब लगा तो मैंने कारण भी पूछ लिया इस तरह से हंसने का, "दरसल अगर यही सब किसी इंडियन के साथ होता तो वो यही कहता के मेरे दोस्त बिछड़ गए हैं। पता नहीं कहाँ चले गए हैं...”

उसकी बातें सुन कर मुझे भी हंसी आ गयी। मैंने रोकना तो बेहद चाहा पर रोक नहीं पाई। अपने बारे में भी कुछ बताइये। मैंने फिर से औपचारिकता में पूछ लिया। "विहान वसु नाम है और स्टोरी राइटर हूँ।" मैं उससे काफी प्रभावित हो रही थी। "तो आप क्या - क्या लिख चुके हो अब तक?" और जानने की उत्सुकता में मैंने पूछ ही लिया। "लिखा तो काफी मुद्दों पर है पर प्रेम पे लगभग १५० से ज्यादा कहानियां लिख चूका हूँ और जिस में १२८ तक प्रकाशित भी हो चुकी हैं।" उसकी आँखें मुझे घूरे जा रही थीं। ऐसा लगा के मुझ में भी वो किसी कहानी को खोज रहा था।

मैं थक चुकी थी। अब और चलना मेरे बस में नहीं था। "अगर आप चाहें तो थोड़ी देर आराम कर सकते हैं।" उसने एक पानी के झरने की तरफ देखते हुए कहा। मुझे वहां बैठा कर वो कहीं चला गया। जब वापिस आया तो हाथों में २ चाय के कप थे। इससे पहले के मैं चाय का एक सिप भी लेती कप मेरे हाथों से फिसल गया। "कोई बात नहीं। आप ये वाली ले लीजिये।" उसने अपना कप मेरे हाथ में थमाते हुए कहा। "और आप ?" इस बार मैंने मन से पूछा, औपचारिकता नहीं की।

"अब क्या कर सकते हैं? पर आप चाहो तो अंत में थोड़ी सी दे सकते हो।" इस बार उसके कहने में शरारत थी। मैं भी मुस्कुरा दी। चाय का एक सिप में लेती तो एक वो। मुझे भी लगने लगा था के इस वक़्त मैं इस लेखक की कहानी की एक नायिका हूँ।

कुछ दूर और चले तो देखा के बोरिस और अनस्तास्या मेरा इंतज़ार कर रहे थे। वो मुझ पे काफी चिल्लाये और फिर अनस्तास्या ने वसु को शुक्रिया कहते हुए कहा, "आप सच में एक अच्छे इंसान हो। आप तो खुद ही इसे लेकर आ गए।" बोरिस और अनस्तास्या को मैंने आगे चलने के लिए कहा और वसु को हैरान हो कर देखती रही।

"तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया के तुम मेरे दोस्तों से मिले थे?" वो हल्का सा मुस्कुराया।

"तुम्हारे साथ फिर इस तरह से यहाँ तक नहीं आ पाता। मेरा मानना है के छोटी-छोटी वार्तालापों में से किसी कहानी का सिर्जन हो सकता है।"

"तो क्या तुम्हें तुम्हारी कहानी मिली?" अंतिम विदा लेने के लिए मैंने उसका हाथ थामते हुए कहा।

"तुमसे दुरी ही तय कर सकती है के तुमने मुझ पे कितना प्रभाव डाला है। कहानी का जन्म हो चूका है और तुम्हारे विछोह ने मुझे अगर जरा सा भी तड़पाया तो मेरी कहानी पूरी हो जाएगी।" उसकी बातों ने मुझे काफी भावुक कर दिया था। मैं नहीं जानती के उसकी कहानी पूरी हुई या नहीं। लेकिन एक विदाई चुंबन के साथ मैं उसके होंठों से विदा लेकर अपने वतन लौट आई।

मैं अतीत में खोयी हुई थी, "तो फिर कहाँ जाने का तुमने सोचा है ?" अल्बर्ट ने बाहें मेरे गले डालते हुए पूछा।

"यहाँ के सबसे अच्छे रेस्तरां में। जो तुम्हें पसंद हो।" कहीं और जाने की इच्छा नहीं हुई। मैं वसु का किस्सा बन चुकी थी और अब बस अल्बर्ट का हिस्सा बनना चाहती थी।

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Sunny Singh "Akash"

Sunny Singh is a poet, author and publisher. He lives in Jawali city of India, and he has written various poems (Gazal and Nazm) in Hindi and Urdu language. He is a very creative person and after listening to his poems, fans forced to him to write stories or novels. So, from there, he tried his hand at writing.
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