मैं तुझ से लाख बिछड़ कर यहाँ वहाँ जाता – सलमान अख़्तर

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मैं तुझ से लाख बिछड़ कर यहाँ वहाँ जाता

मिरी जबीन से सज्दों का कब निशाँ जाता

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ज़मीन मुझ को समझती आसमाँ कोई

गुनाहगार ही कहलाता मैं जहाँ जाता

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नसीब से तो मिले थे फ़क़त ये ख़ाली हाथ

फ़राख़-दिल वो होता तो मैं कहाँ जाता

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मुझे ख़बर थी इस घर में कितने कमरे हैं

मैं कैसे ले के वहाँ सारी दास्ताँ जाता

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मैं एक गूँज की मानिंद लौटता उस तक

जहाँ से मुझ को बुलाता मैं बस वहाँ जाता

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